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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
भ्रमन्त इव शूरस्य शरव्राता महात्मनः |  ७   क
अदृश्यन्तान्तरिक्षस्थाः शतशोऽथ सहस्रशः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति