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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
आददानं महेष्वासं सन्दधानं च पाण्डवम् |  ८   क
विसृजन्तं च कौन्तेय़ं नानुपश्यामहे तदा ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति