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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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भीष्म उवाच
अज्ञानसागरो घोरो ह्यव्यक्तोऽगाध उच्यते |  ४९   क
अहन्यहनि मज्जन्ति यत्र भूतानि भारत ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति