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आदि पर्व
अध्याय १२२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनं मूर्ध्नि तदा समाघ्राय़ पुनः पुनः |  ४४   क
प्रीतिपूर्वं परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति