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आदि पर्व
अध्याय १२२
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द्रुपद उवाच
न सख्यमजरं लोके जातु दृश्येत कर्हिचित् |  ५   क
कामो वैनं विहरति क्रोधश्चैनं प्रवृश्चति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति