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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
ये च दम्पतिधर्माणः स्वदारनिय़तेन्द्रिय़ाः |  २५   क
चरन्ति विधिदृष्टं तदृतुकालाभिगामिनः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति