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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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भीष्म उवाच
यत्र यत्र च वक्तव्यं तद्वक्ष्यामि जनार्दन |  २२   क
तव प्रसादाद्धि शुभा मनो मे वुद्धिराविशत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति