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शान्ति पर्व
अध्याय ११७
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भीष्म उवाच
व्याघ्रं दृष्ट्वा क्षुधाभग्नं दंष्ट्रिणं वनगोचरम् |  १८   क
द्वीपी जीवितरक्षार्थमृषिं शरणमेय़िवान् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति