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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्य च पुत्राणां पौत्राणां सुहृदामपि |  ६२   क
चकार कदनं घोरं दृष्ट्वा दृष्ट्वा महावलः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति