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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
ते चापि कुशलैर्वैद्यैर्निपुणैः सम्भृतौषधैः |  १५   क
व्याधय़ो विनिवार्यन्ते मृगा व्याधैरिव द्विज ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति