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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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जनक उवाच
व्रह्मणैकेन जातानां नानात्वं गोत्रतः कथम् |  १०   क
वहूनीह हि लोके वै गोत्राणि मुनिसत्तम ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति