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शान्ति पर्व
अध्याय ९९
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इन्द्र उवाच
चापवेगाय़तस्तीक्ष्णः परकाय़ावदारणः |  १८   क
ऋजुः सुनिशितः पीतः साय़कोऽस्य स्रुवो महान् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति