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आदि पर्व
अध्याय ६७
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वैशम्पाय़न उवाच
विश्वास्य चैनां स प्राय़ादव्रवीच्च पुनः पुनः |  २०   क
प्रेषय़िष्ये तवार्थाय़ वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् |  २०   ख
तय़ा त्वामानय़िष्यामि निवासं स्वं शुचिस्मिते ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति