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अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
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वाय़ुरु उवाच
व्राह्मणान्क्षत्रधर्मेण पालय़स्वेन्द्रिय़ाणि च |  २३   क
भृगुभ्यस्ते भय़ं घोरं तत्तु कालाद्भविष्यति ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति