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वन पर्व
अध्याय २७०
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येवमुक्त्वा विविधैर्वादित्रैः सुमहास्वनैः |  २०   क
शय़ानमतिनिद्रालुं कुम्भकर्णमवोधय़त् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति