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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
अकामय़ानेन मय़ा विशिखैरर्दितो भृशम् |  १८   क
अवासीदद्रथोपस्थे प्राणान्पीडय़तीव मे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति