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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
तदिदं नरकाय़ाद्य कृतं कर्म मय़ा ध्रुवम् |  २३   क
आचार्यं शरवर्षेण रथे सादय़ता कृपम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति