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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
महता शरवर्षेण पाण्डवं समवाकिरत् |  ३   क
द्रौणिश्चाभ्यद्रवत्पार्थं रथमास्थाय़ फल्गुनम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति