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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
न च तावत्क्षमः पार्थ कर्णेन तव सङ्गरः |  ३३   क
प्रज्वलन्ती महोल्केव तिष्ठत्यस्य हि वासवी |  ३३   ख
त्वदर्थं पूज्यमानैषा रक्ष्यते परवीरहन् ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति