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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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धृतराष्ट्र उवाच
सात्यकिश्चापि विरथः कं समारूढवान्रथम् |  ३६   क
चक्ररक्षौ च पाञ्चाल्यौ तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति