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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
हन्त ते वर्णय़िष्यामि यथावृत्तं महारणे |  ३७   क
शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा दुराचरितमात्मनः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति