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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
तावेनं रथिनां श्रेष्ठौ रथाभ्यां रथसत्तमम् |  ४   क
उभावुभय़तस्तीक्ष्णैर्विशिखैरभ्यवर्षताम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति