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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
दारुकोऽवेत्य सन्देशं श्रुत्वा शङ्खस्य च स्वनम् |  ४३   क
रथमन्वानय़त्तस्मै सुपर्णोच्छ्रितकेतनम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति