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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
युक्तं समारुह्य च तं विमानप्रतिमं रथम् |  ४६   क
अभ्यद्रवत राधेय़ं प्रवपन्साय़कान्वहून् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति