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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
राधेय़ोऽपि महाराज शरवर्षं समुत्सृजन् |  ४८   क
अभ्यद्रवत्सुसङ्क्रुद्धो रणे शैनेय़मच्युतम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति