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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
सर्वे च समपश्यन्त तद्युद्धमतिमानुषम् |  ५१   क
तय़ोर्नृवरय़ो राजन्सारथ्यं दारुकस्य च ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति