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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
नभस्तलगताश्चैव देवगन्धर्वदानवाः |  ५३   क
अतीवावहिता द्रष्टुं कर्णशैनेय़यो रणम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति