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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
सोऽजिघांसुर्गुरुं सङ्ख्ये गुरोस्तनय़मेव च |  ६   क
चकाराचार्यकं तत्र कुन्तीपुत्रो धनञ्जय़ः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति