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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपाहरत् |  ६१   क
अश्वांश्च चतुरः श्वेतान्निजघ्ने निशितैः शरैः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति