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भीष्म पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणं च युधि संरव्धं मां च निर्जित्य संय़ुगे |  ९   क
कर्णं च त्वां च द्रौणिं च कृपं च सुमहारथम् |  ९   ख
वासांसि स समादत्त पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति