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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
कृष्णय़ोः सदृशो वीर्ये सात्यकिः शत्रुकर्शनः |  ७३   क
कृष्णो वापि भवेल्लोके पार्थो वापि धनुर्धरः |  ७३   ख
शैनेय़ो वा नरव्याघ्रश्चतुर्थो नोपलभ्यते ||  ७३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति