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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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धृतराष्ट्र उवाच
दारुकेण समाय़ुक्तं स्ववाहुवलदर्पितः |  ७५   क
कच्चिदन्यं समारूढः स रथं सात्यकिः पुनः ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति