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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
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सञ्जय़ उवाच
उपाजह्रुस्तमास्थाय़ कर्णोऽप्यभ्यद्रवद्रिपून् |  ८५   क
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति