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आदि पर्व
अध्याय १२३
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनस्तु परं यत्नमातस्थे गुरुपूजने |  १   क
अस्त्रे च परमं योगं प्रिय़ो द्रोणस्य चाभवत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति