द्रोण पर्व  अध्याय ११४

सञ्जय़ उवाच

पुनः पुनस्तूवरक मूढ औदरिकेति च |  ६९   क
अकृतास्त्रक मा योत्सीर्वाल सङ्ग्रामकातर ||  ६९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति