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अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
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च्यवन उवाच
तत्तु कर्म समारव्धं दृष्ट्वेन्द्रः क्रोधमूर्छितः |  २१   क
उद्यम्य विपुलं शैलं च्यवनं समुपाद्रवत् |  २१   ख
तथा वज्रेण भगवानमर्षाकुललोचनः ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति