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आदि पर्व
अध्याय १२३
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वैशम्पाय़न उवाच
एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमाय़ान्तमन्तिकात् |  ३१   क
अभिगम्योपसङ्गृह्य जगाम शिरसा महीम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति