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शान्ति पर्व
अध्याय २७५
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समङ्ग उवाच
समाहितो न स्पृहय़ेत्परेषां; नानागतं नाभिनन्देत लाभम् |  १४   क
न चापि हृष्येद्विपुलेऽर्थलाभे; तथार्थनाशे च न वै विषीदेत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति