शान्ति पर्व  अध्याय १२३

कामन्द उवाच

यो धर्मार्थौ समुत्सृज्य काममेवानुवर्तते |  १४   क
स धर्मार्थपरित्यागात्प्रज्ञानाशमिहार्छति ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति