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शान्ति पर्व
अध्याय १२३
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कामन्द उवाच
तं प्रजा नानुवर्तन्ते व्राह्मणा न च साधवः |  १७   क
ततः सङ्क्षय़माप्नोति तथा वध्यत्वमेति च ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति