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शान्ति पर्व
अध्याय १२३
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कामन्द उवाच
गुरवोऽपि परं धर्मं यद्व्रूय़ुस्तत्तथा कुरु |  २४   क
गुरूणां हि प्रसादाद्धि श्रेय़ः परमवाप्स्यसि ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति