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अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
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अङ्गिरा उवाच
चैत्रं तु निय़तो मासमेकभक्तेन यः क्षपेत् |  २२   क
सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये कुले महति जाय़ते ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति