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शान्ति पर्व
अध्याय २७५
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समङ्ग उवाच
एताञ्शोकभय़ोत्सेकान्मोहनान्सुखदुःखय़ोः |  १८   क
पश्यामि साक्षिवल्लोके देहस्यास्य विचेष्टनात् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति