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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
अत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनरत्रोदय़न्ति च |  १५   क
सप्त देवर्षय़स्तात वसिष्ठप्रमुखाः सदा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति