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वन पर्व
अध्याय १२३
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लोमश उवाच
यथाहं रूपसम्पन्नो वय़सा च समन्वितः |  २१   क
कृतो भवद्भ्यां वृद्धः सन्भार्यां च प्राप्तवानिमाम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति