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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
पत्तीनां द्रवतां चैव पदशव्देन मेदिनी |  ३१   क
अकम्पत महाराज भय़त्रस्तेव चाङ्गना ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति