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कर्ण पर्व
अध्याय ३४
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सञ्जय़ उवाच
चिरकालाभिलषितो ममाय़ं तु मनोरथः |  २१   क
अर्जुनं समरे हन्यां मां वा हन्याद्धनञ्जय़ः |  २१   ख
स मे कदाचिदद्यैव भवेद्भीमसमागमात् ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति