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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
तावद्गर्जसि राधेय़ यावत्पार्थं न पश्यसि |  २१   क
पुरा पार्थं हि ते दृष्ट्वा दुर्लभं गर्जितं भवेत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति