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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
पश्यतां सर्वसैन्यानां केशवस्य ममैव च |  १२   क
विरथो भीमसेनेन कृतोऽसि वहुशो रणे |  १२   ख
न च त्वां परुषं किञ्चिदुक्तवान्पण्डुनन्दनः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति