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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
यस्मात्तु वहु रूक्षं च श्रावितस्ते वृकोदरः |  १३   क
परोक्षं यच्च सौभद्रो युष्माभिर्निहतो मम ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति